जल का संसाधनीय उपयोग: जनपद गाजीपुर का प्रतीक अध्ययन

 

शिव कुमार राम

शोधार्थी (भूगोल) शा.ठा.रण.सिंह महाविद्यालय, रीवा (0प्र0)

*Corresponding Author E-mail:

 

शोध सारांश:

अध्ययन क्षेत्र में जल का संसाधनीय उपयोग मानव द्वारा घरेलू जलापूर्ति, सिंचाई, में उपयोग, औद्योगिक जलापूर्ति, मत्स्यपालन एवं जल का अन्य उपयोग आदि जल का उपयोग वृहद पैमाने पर किया जाता है। भूमिगत जल एवं सतही जल का उपयोग संसाधन के रूप में किया जाता है।

 

शब्दकुंजी: जल का संसाधनीय उपयोग

 


प्रस्तावनाः

अध्ययन क्षेत्र जनपद गाजीपुर का नामकरण महाराजा गाँध के नाम पर हुआ है जो इसका अक्षांशीय विस्तार 25019’ उत्तरी अक्षांश से 25054’ उत्तरी अक्षांश तक एवं देशान्तरीय विस्तार 8304’ पूर्वी देशांतर से 83058’ पूर्वी देशांतर तक विस्तृत है। इसका भौगोलिक क्षेत्रफल 3377 वर्ग किमी. है तथा समुद्र तल से 67.50 मीटर ऊँचाई पर स्थित है। इसकी पूरब से पश्चिम की लंबाई 90 किमी. और उत्तर से दक्षिण की चैडाई 64 किमी. है। उत्तर में मऊ, दक्षिण में चन्दौली, पश्चिम में जौनपुर, दक्षिण-पश्चिम भाग में वाराणसी, उत्तर-पूरब में बलिया, उत्तर-पश्चिम में आजमगढ जनपदों की सीमायें हैं तथा दक्षिण-पूर्व की ओर बिहार प्रदेश की प्रादेशिक सीमा है। उत्तर प्रदेश में क्षेत्रफल की दृष्टि से 50 वाँ स्थान तथा 2011 जनगणना के अनुसार जनसंख्या दृष्टि से 30वाॅ स्थान पर है।

 

 

 

प्रशासनिक दृष्टिकोण से जनपद को 7(सात) तहसीलों तथा 16(सोलह) विकासखण्डों में विभक्त है। जनपद में 193 न्याय पंचायतें एवं 1047 ग्राम सभाये है। जनपद में संपूर्ण गाँवों की संख्या 3364 है जिसमें 2665 आबाद एवं 699 गैर आबाद गाँव है। अध्ययन क्षेत्र एक समतल उपजाऊ मैदानी भाग है, जहाँ दोमट, मटियारा तथा दोरस मिट्टीयों की प्रधानता है जिसका च्भ् मान 6.8 से ऊपर है जनपद का ढाल 0.000140 से 0.000630 के मध्य ळें

 

अध्ययन का उद्देश्य -

1.      अध्ययन क्षेत्र में भूमिगत जल का स्वरूप प्रस्तुत करना।

2.      अध्ययन क्षेत्र में भूमिगत जल एवं सतही जल का उपयोग का प्रारूप प्रदर्शित करना।

3.      जल संसाधन के प्रबंधन को रूपरेखा प्रस्तुत करना।

4.      क्षेत्रीय विकास क्षेत्री संसाधनों पर होना।

       

 

 

शोध विधि:-

अध्ययन प्राथमिक एवं द्वितीयक स्रोतो से एकत्र आँकड़ो एवं सूचनाओं पर आधारित है। अध्ययन क्षेत्र में प्राथमिक तथ्यांे का संग्रहण किया गया है। द्वितीय सांख्यिकीय पुस्तिका, भू-अभिलेख सिंचाई विभाग, जल निगम, जलाशयों, हैण्डपम्पों एवं नलकूपों द्वारा भूमिगत जल का निरीक्षण, जल की स्थिति, जल उपयोग की मदें, जल प्राप्ति का स्रोत, आदि के तहत अध्ययन किया गया है।

 

जल एक नवीकरणीय प्राकृतिक संसाधन है क्योंकि वर्षा के द्वारा इसकी पुनःपूर्ति होती है प्रकृति ने जल, हमें निःशुल्क उपहार के रूप में प्रदान किया है। अतः जल पृथ्वी को प्राप्त, प्रकृति का श्रेष्टम् उपहार है। ऋग्वेद में कहा गया है कि ‘‘जल औषधि है यह रोगों का शत्रु है, यही समस्त रोगों का नाश करेगा।’’ आधुनिक वैज्ञानिक भी स्वीकार करते है कि जल जीवन्त जगत का प्राण है।

 

मानव द्वारा स्थलीय जल संसाधनों का उपयोग -

जल एक दुर्लभ प्राकृतिक संसाधन है जो जीवन, जीविका, खाद्य सुरक्षा और निरंतर विकास का आधार है। प्रकृति का यह अनुपम उपहार पृथ्वी को उदारता से बड़ी मात्रा में मिला है। जिसका मानव द्वारा उपयोग उतनी बड़ी मात्रा में किया जा रहा है अध्ययन क्षेत्र में जल के उपयोग को निम्न वर्गों में विभक्त कर सकते हैं-

 

(1) घरेलू जलापूर्ति -

मानव द्वारा पानी पीने, खाना बनाने स्नान करने, कपड़ा धोने, शौचालय सफाई करने जैसे आदि कार्यों हेतु जल का दैनिक उपयोग हो रहा है।

 

(2) सिंचाई में उपयोग -

अध्ययन क्षेत्र में बढ़ती जनसंख्या के भरण-पोषण हेतु खाद्यान्न की माँग बढ़ी है खाद्यान्न को पूरा करने हेतु सिंचाई के साधनों में दिनों-दिन वृद्धि हो रही है।

 

(3) औद्योगिक जलापूर्ति -

अध्ययन क्षेत्र में अफीम फैक्ट्री, सुखबीर एग्रो एनर्जी बडे़ उद्योग के अलावा खड़सारी मिल, शराब मील, कोल्ड स्टोरेज, राइसमिल जैसे छोटे-छोटे उद्योग पर्याप्त मात्रा में संचालित है जिसमें जल की खपत वृहद् पैमाने पर होती है।

(4) मत्स्य पालन -

अध्ययन क्षेत्र में मत्स्य पालन का कार्य निजी तथा सार्वजनिक तालाबों में किया जाता है जिसमें वार्षिक जल की खपत वृहद् पैमाने पर होता है।

 

(5) जल का अन्य उपयोग -

जल का उपयोग अन्य विभिन्न मदों में उपयोग होता है जो निम्नवत् है-

() सार्वजनिक उपयोग एवं निर्माण कार्य हेतु

() अग्निशामक यंत्रों हेतु

() नौका परिवहन, क्रीडा, पर्यटन और मनोरंजन कार्यों में जल का महत्व है।

 

मानव द्वारा स्थालीय जल संसाधनों का उपयोग -

अध्ययन क्षेत्र में सतही जल की अपेक्षा भूमिगत जल का उपयोग विभिन्न कार्यों में अधिक हो रहा है अतः जनपद में वर्तमान जल उपयोग की आवश्यकता एवं जल के दीर्घकालिक उपयोग को ध्यान में रखकर वर्षा जल को अधिक से अधिक संचयन हेतु सतही जल संसाधनों के विकास की आवश्यकता है।

 

() जल की माँग -

संसाधनीय रूप में जल की माँग घरेलू उपयोग, पीने का पानी, पशुपालन, सिंचाई, मत्स्यपालन, परिवहन, उद्योग आदि क्षेत्रों में है। अध्ययन क्षेत्र में प्रयुक्त होने वाले जल का 13 घरेलू कार्य में 73 सिंचाई में तथा शेष 14 अन्य कार्यों में उपयोगिता संभव हो पायी है।

 

() पीने का पानी-

जल ही जीवन है, जनपद की समस्त जनसंख्या को दैनिक उपयोग में आने वाले जल की पूर्ति कुआँ, हैण्डपंप, नलकूप, जलनिगम, ट्यूबेल, पंपिंगसेट, समरसेबुल, तालाब, एवं नदियों से होती है। ग्रामीण क्षेत्र में प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन 70 से 75 लीटर जल का उपयोग करता है वहीं नगरीय क्षेत्रों में प्रतिदिन प्रतिव्यक्ति द्वारा लगभग 90 से 100 लीटर पानी का उपयोग करता है।

 

 

() पशुपालन में पानी का उपयोग -

अध्ययन क्षेत्र में कुल पालतू पशुओं की संख्या सन् 2012-13 की जनगणना के अनुसार 1242328 है इन पशुओं से दुग्ध उत्पादन, मालवाहन ईंधन मांस प्राप्ति खाल होता है। एक अनुमान के अनुसार गोवंशीय पशुओं के लिए 135 लीटर, भैंस वंशीय के लिए 155 लीटर, बकरे एवं बकरियों के लिए 8 लीटर, खच्चर एवं गधे के लिए 45 लीटर प्रतिदिन जल की आवश्यकता होती है। इस मद में जनपद के कुल वार्षिक खपत कुआँ, तालाब, नदियों, हैण्डपंप, ट्यूबेलो आदि द्वारा पूर्ण किया जाता है।

 

() सिंचाई में पानी का उपयोग -

अध्ययन क्षेत्र की कृषि मानसूनी वर्षा पर निर्भर होने के कारण कभी अनावृष्टि एवं कभी अतिवृष्टि का शिकार हो जाया करती है। वर्ष 2016-17 के आंकड़े के अनुसार जनपद में विभिन्न फसलों की सिंचाई हेतु मुख्यातः भूजल संसाधनों एवं नहरों का उपयोग होता है। जनपद में लगभग 72 सिंचाई भूजल द्वारा होता है तथा 28 सिंचाई नहरों द्वारा होती है। जनपद में 1490 किमी. नहरों का नेटवर्क है।

 

(1) कुआँ -

पीने का पानी एवं सिंचाई के लिए कुओं का प्रयोग प्राचीन काल से ही किया जा रहा है। यह 1970 के दशक में कुआँ के जल का उपयोग 95 होता था परन्तु आज के समय इसका स्थान हैण्डपंप एवं समरसेबल ने ले लिया है। पेयजल के रूप में कुओं का उपयोग नाम मात्र का है। सन् 1970 में 70 सिंचाई कुआँ से ढेकुल, मोट, रहट आदि द्वारा की जाती थी। वहीं आज केवल अध्ययन क्षेत्र के विकासखण्ड- जखनियाँ, में 4 हेक्टेयर, मनिहारी में 3 हेक्टेयर, सादात में 4 हेक्टेयर, करण्डा में 3 हेक्टेयर एवं कासिमाबाद में 4 हेक्टेयर कृषि भूमि की सिंचाई की जाती है।

 

(2) नलकूप -

अध्ययन क्षेत्र में सरकारी नलकूप, निजी नलकूप एवं वोरिंग पर लगे पंप सेटों की संख्या 50145 है जिनके द्वारा कुल सिंचित क्षेत्र के 72.3 भूमि में सिंचाई की जाती है। अध्ययन क्षेत्र के सिंचाई के सन्दर्भ में यह कहा जा सकता है कि यहाँ की कृषिगत भूमि आज भी नलकूपों पर ही निर्भर हैं

 

(3) नहरें -

अध्ययन क्षेत्र के पूर्णतया मैदानी भाग में अवस्थित होने के कारण नदियों पर बाँध द्वारा नहर निकालना संभव नहीं है इसलिए यहाँ नदियों के जल को लिफ्ट द्वारा (पम्पकैनाल) सिंचाई क्षेत्र में वितरित किया जाता है। सन् 2016-17 में राजकीय नहरों द्वारा शुद्ध सिंचित क्षेत्रफल का कुल सिंचित क्षेत्रफल से मात्र 27.7 ही सिंचाई की जाती है। जनपद में नहरों की लम्बाई 1490 किमी. है।

 

देवकली पम्पनहर प्रखण्ड प्रथम गाजीपुर -

जिसे लोकार्पण के समय तत्कालिन सरकार द्वारा ‘‘चैधरी चरण सिंह जमानियाँ पम्पनहर प्रणाली, जमानियाँ गाजीपुर’’ नाम दिया इसका निर्माण 1972-73 में किया गया। इस मुख्य नहर के अतिरिक्त दो राजवाहा हैं।

1.      ताड़ी घाट राजवाहा जिसकी लंबाई 27.95 किमी. है।

2.      नौली राजवाहा इसकी लंबाई 16.4 किमी. है यहाँ की पूरी नहरों की लंबाई 200.92 किमी. है और 789 जल डिस्चार्ज होते हैं।

 

देवकली पम्प नहर प्रखण्ड द्वितीय, गाजीपुर -

इस पम्पनहर प्रखण्ड को चैधरी चरण सिंह देवकली के नाम से ही जाना जाता है यह नहर प्रखण्ड सैदपुर के जौहरगंज नामक स्थान पर 1978 में निकाली गयी। यह बहुत बड़ी नहर प्रणाली है इसमें मुख्य नहर की लम्बाई 39.2 किमी. है जिसमें 1050 क्यूसेक पानी छोड़ा जाता है। इस मुख्य नहर से 9 राजवाह निकाला गया है जो इस प्रकार है-

(1) गाजीपुर राजवाहा - लंबाई 24.800 किमी.

(2) खालिसपुर राजवाहा - लंबाई 8.900 किमी.

(3) सावास राजवाहा - लंबाई 10.800 किमी.

(4) जंगीपुर राजवाहा - लंबाई 12.300 किमी.

(5) मरदह राजवाहा - लंबाई 33.400 किमी.

(6) हैदरगंज राजवाहा - लंबाई 7.000 किमी.

(7) बिरनों राजवाहा - लंबाई 45.200 किमी.

(8) राजापुर राजवाहा - लंबाई 17.00 किमी.

(9) दलपतपुर राजवाहा - लंबाई 24.000 किमी.

 

इस प्रखण्ड में मुख्य नहर, राजवाहा एवं माइनर की कुल लंबाई 594.475 किमी. है जिससे अध्ययन क्षेत्र के सैदपुर, सादात, मनिहारी, देवकली, जखनियाँ, विरनों, मरदह, कासिमाबाद, एवं वाराचवर विकासखण्ड लाभान्वित होते हैं।

 

लघुडाल नहरखण्ड, गाजीपुर -

लघुडाल नहरखण्ड के अन्तर्गत कुल 17 नहर प्रणाली है। इससे 64 माइनर निकाली गयी हैं। 63 माइनर के टेल है अमौरा माइनर-भदौरा के टेल नहीं हैं। इन 17 नहरखण्ड प्रणालियों की कुल लंबाई 150 किमी. है तथा इसमें 353.50 क्यूसेक पानी छोड़ा जाता है।

 

जलज कृषि -

जलज कृषि के विकास के लिए प्राकृतिक एवं कृत्रिम जलाशय (तालाब) होना अनिवार्य है। तालाब वर्षा जल को संचित करने का मुख्य भूमिका निभाता है। अध्ययन क्षेत्र में जलज कृषि के अन्तर्गत मत्स्यपालन एवं सिंघाड़ा की कृषि प्रमुख है।

 

उद्योग में जल का उपयोग, परिवहन में जल का उपयोग, मत्स्यपालन, सिंघाड़ा की खेती, पानी का अन्य उपयोग-जल ऊर्जा का स्थाई स्रोत है। यदि 12 घन फीट जल को प्रति सेकेंड की गति से मात्र एक फीट की ऊँचाई से गिराया जाय तो उससे एक किलोवाट ऊर्जा उत्पन्न होती है। जनपद गाजीपुर में गंगा नदी पर स्थित देवकली पंपनहर के दोनों प्रखण्ड़ों के उद्गम पर जल विद्युत (उत्पादन) को विकसित किया जा सकता है।

 

निष्कर्ष -

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि अध्ययन क्षेत्र में सतही जल की अपेक्षा भूमिगत जल का उपयोग विभिन्न कार्यो में अधिक हो रहा है। जिससे वार्षिक जल की खपत वृहद पैमाने पर होता है। जनपद में लगभग 72 सिचाई भू-जल के द्वारा होता है। जबकि 28 सिचाई नहरों द्वारा की जाती है। जनपद में सरकारी नलकूप निजी नलकूप एवं समरसेंबल पम्प की संख्या 50145 है तथा नहरो की लम्बाई 1490 कि.मी. में फैली है। बढ़ती जनसंख्या के भरण पोषण के लिए खाद्यान की मांग बढ़ी है इसकी पूर्ति करने के लिए सिंचाई के साधनो में दिन प्रतिदिन वृद्धि हो रही है औद्योगिक क्षेत्रों में भी जल की खपत होने से अवशिष्ट जल के द्वारा जल दूषित होता जा रहा है। अध्ययन क्षेत्र में सर्वाधिक राजकीय नलकूप 88, भाॅवर कोल विकासखण्ड में है और सबसे नलकूप 20 मरदह विकासखण्ड में है इसी क्रम में सबसे अधिक निजी नलकूप 6721 देवकली विकासखण्ड में एवं सबसे कम गाजीपुर विकासखण्ड में 2776 हैं। सबसे अधिक नहर की लम्बाई विकास जमानियाॅ में 217 कि.मी. है एवं सबसे कम लम्बाई मोहम्मदाबाद तथा भांवरकोल में शून्य कि.मी. है। जिससे जल का उपयोग सिंचाई तथा पीने के लिए घरेलू उपयोग एवं अन्य उपयोगों में भूमिगत जल से किया जाता है।

 

सन्दर्भ ग्रन्थ सूची

1ण्     डाॅ. गौतम, अलका, आर्थिक भूगोल के मूल तत्व, द्वितीय संस्करण 2006

2ण्     डाॅ. कौशिक एस.डी.संसाधन भूगोल, प्रथम संस्करण, 1986-87

3ण्     डाॅ. चैहान, विरेन्द्र सिंह और गौतम्, अलका - भारत का विस्तृत भूगोल रस्तोगी पब्लिेकशन मेरठ 1987

4ण्     ैपहीेदजी त्ण्डण् ंदक रवदण् ेवदण् ळवअण् िमबवदवकपजल चतवकनबजपवद रण्ठ सपचचपंजस मवण् बीपबंहव 1958

5ण्     अधि. अभि. नहर प्रखण्ड, गाजीपुर

6ण्     क्पेजतपबज हं्रमजममत ;1970द्ध

7ण्     त्ंहीनदंजीए भ्ण्डण् . भ्लकतवसवहल चंहम 1 . ेमबवदक मकपजपवद . 2010

8ण्     भूगर्भ जल विभाग उत्तर प्रदेश - 2017

 

 

 

 

Received on 25.11.2019            Modified on 14.12.2019

Accepted on 31.12.2019            © A&V Publications All right reserved

Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2019; 7(4):761-764.